Ma Baglamukhi Sadhana Rahasya

‘वेद’ एवं ‘तन्त्र’ के सन्दर्भ में : सिद्धि-प्रदा श्रीबगला-मुखी “राष्ट्र-गुरु’ श्री स्वामी जी महाराज

‘शक्ति’-उपासना में काली, तारा और षोडशी विद्या के ही रूप ध्येय, ज्ञेय रूप से विशेषत: प्रचार में हैं। अन्य महा-विद्याओ के विषय में बहुत कम ही प्रकाश हुआ है। श्रीबगला-मुखी महा-विद्या के विषय में ‘वेद’ एवं ‘तन्त्र’ – ग्रन्थों में जो कुछ कहा गया है; उस पर यहाँ कुछ विचार करते हैं, जिससे श्रीबगला विद्या का रहस्य पाठकों को व्यक्त होगा। माँ बगलामुखी साधना से सम्बंधित अधिक जानकारी के लिए गुरुदेव श्री योगेश्वरानंद जी से संपर्क करें – 9917325788, 9410030994

“स्वतन्त्र तन्त्र’ में भगवान् शङ्कर, पार्वती जी से कहते हैं कि ‘हे देवि! श्रीबगला विद्या के आविर्भाव को कहता हूँ। पहले कृत-युग में सारे जगत् का नाश करनेवाला वात-क्षोभ (तूफान) उपस्थित हुआ। उसे देखकर जगत् की रक्षा में नियुक्त भगवान् विष्णु चिन्ता-परायण हुए। उन्होंने सौराष्ट्र देश में ‘हरिद्रा सरोवर’ के समीप तपस्या कर श्रीमहा-त्रिपुर-सुन्दरी भगवती को प्रसन्न किया। श्री श्रीविद्या ने ही बगला-रूप से प्रकट होकर समस्त तूफान को निवृत्त किया। त्रैलोक्य-स्तम्भिनी ब्रह्मास्त्र बगला महा-विद्या श्री श्रीविद्या एवं वैष्णव-तेज से युक्त हुई।

मङ्गलवार-युक्त चतुर्दशी, मकार, कुल-नक्षत्रों से युक्त ‘वीर-रात्रि कही जाती है। इसी की ‘ अर्ध-रात्रि’ में श्रीबगला का आविर्भाव हुआ था।

उक्त कथानक के अनुकूल ‘कृष्ण-यजुर्वेद’ की काठक-संहिता में दो मन्त्र आए हैं, जिनसे श्रीबगला विद्या का वैदिक रूप प्रकट होता है-
विराड्-दिशा विष्णु-पत्यघोरास्येशाना सहसो या मनोता ।
विश्व-व्यचा इषयन्ती सुभूता शिवा नो अस्तु अदितिरुपस्थे।।
विष्टम्भो दिवो धरुणः पृथिव्या अस्येशाना सहसो विष्णु-पत्नी।
वृहस्पतिर्मातारश्वोत वायुस्संध्वाना वाता अभितो गृणन्तु ॥
(काठक संहिता, २२ स्थानक, १, २ अनु० ४९, ५०)

अर्थात् – विराट् दिशा’ दशों दिशाओं को प्रकाशित करनेवाली, ‘अघोरा’ सुन्दर स्वरूपवाली, ‘विष्णु-पत्नी’ विष्णु की रक्षा करनेवाली वैष्णवी महा-शक्ति, ‘अस्य’ त्रिलोक जगत् की ‘ईशाना’ ईश्वरी तथा ‘सहसः ‘महान् बल को धारण करनेवाली ‘मनोता’ कही जाती है।

‘मनोता’ का विवेचन ऐसा किया गया है-
वाग् वै देवानां मनोता तस्यां हि तेषां मनांसि ओतानि
अग्निर्वै देवानां मनोता तस्मिन् हि तेषां मनांसि ओतानि !
गौर्हि देवानां मनोता तस्यां हि तेषां मनांसि ओतानि | | (ऐतरेय ब्राह्मण २, १०)

अर्थात् देवताओं का मनस्तत्त्व वाक्, अग्नि और गौ में ओत-प्रोत है। अत: इन तीनों शक्तियों के समुदाय को मनोता’ कहते हैं।

‘विश्व -व्यचा’ अन्तरिक्ष लोक-स्वरूप समस्त नक्षत्र-मण्डल में प्रकाशित होनेवाली (‘अन्तरिक्षं विश्व-व्यचाः ‘तैत्तरीय ब्राह्मण ३-२-३७)।

‘इषयन्ती’ समस्त जगत् को प्रेरित करनेवाली इच्छा-शक्ति-रूपा।

‘सुभूता’ आनन्दार्थ अनेक रूपों में आविर्भाव होनेवाली।

‘अदितिः’ अविनाशी-स्वरूप देव-माता ‘उपस्थे’ हम उपासकों के समीप, ‘शिवा’ कल्याण-स्वरूपवाली, ‘अस्तु’ हो।

‘दिवः विष्टम्भ:’ अर्थात् दिव-लोक का स्तम्भन करनेवाली।

इस प्रकार ‘कृष्ण यजुर्वेद’ के उक्त मन्त्र में आया ‘विष्टम्भः’ पद श्रीबगला विद्या के प्रसिद्ध ‘स्तम्भन’-तत्त्व को बताता है।

‘धरुणः पृथिव्याः’ पद पृथिवी तत्त्व की प्रतिष्ठा बताता है-‘प्रतिष्ठा वै धरुणम्’ (शतपथ ब्राह्मण ७-४-२-५)।

श्रीबगला विद्या का बीज पार्थिव है-‘बीजं स्मेरत् पार्थिवम्’ तथा बीज-कोश में इसे ही ‘प्रतिष्ठा कला’ भी कहते हैं।

‘अस्य सहसः ईशाना’ सारे जगत् पर जिसका शासन है, उन ‘विष्णु-पत्नी’ अर्थात् विष्णु की रक्षा करनेवाली, वृहस्पति, मात-रिश्वा और वायु-रूपवाली, ‘संध्वाना’ शब्द-तत्त्व का कारण, ‘वाता’ वात-क्षोभ को शान्त करनेवाली, ‘अभितो गृणन्तु’ हमें उभय-लोक में भुक्ति एवं मुक्ति अर्थात् ‘स्वर्गापवर्ग-प्रदे’ प्रदान वरनेवाली श्रीबगला विद्या को बताता है।

इस प्रकार स्पष्ट होता है कि ‘स्वतन्त्र तन्त्र’ में उल्लिखित कथा और ‘कृष्ण यजुर्वेद’ के दोनों मन्त्रों में कथित श्रीबगला-तत्त्व अभिन्न हैं।

भगवती बगला का वास्तविक रूप
आभिचारिक प्रसङ्गों में श्रीबगला विद्या की प्रधानता होने से बहुत से लोग इन्हें ‘तामसिक शक्ति’ कहते हैं। ‘कामधेनु-तन्त्र’ में तामस प्रकरण में ही इनकी गणना की गई हैं और ‘कल्याण’ के शक्ति-अङ्क के ‘दश महा-विद्या’ शीर्षक लेख में पं० मोतीलाल शर्मा ने शत्रु-निरोध में ही इस विद्या का उपयोग लिखा है, परन्तु यह बात एक-देशीय है, प्रधानता के अभिप्राय में ही है, वास्तविक रूप से नहीं। ‘शक्ति-सङ्गम-तन्त्र’ (तारा-खण्ड) में तो
श्रीबगला को त्रि-शक्ति-रूप में माना गया है-
सत्ये काली च श्रीविद्या, कमला भुवनेश्वरी ।
सिद्ध-विद्या महेशानि!, त्रिशक्तिर्बगला शिवे! । ।

अत: श्रीबगला माता को तामस मानना ठीक नहीं है। आभिचारिक कृत्यों में रक्षा की ही प्रधानता होती है। यह कार्य इसी शक्ति द्वारा निष्पन्न होता है। इसीलिए इसके बीज की एक संज्ञा ‘रक्षा-बीज’ भी है (देखिए, मन्त्र-योग-संहिता)-
शिव-भूमि-युत शक्ति-नाद-विन्दु-समन्वितम्।
वीजं रक्षा-मयं प्रोक्तं, मुनिभिर्ब्रह्म-वादिभि:।।

“यजुर्वेद’के प्रसिद्ध ‘आभिचारिक प्रकरण’ में अभिचार-स्वरूप की निवृत्ति में इसी शक्ति का विनियोग किया गया है। इस प्रकरण का ‘यजुर्वेद’ की सभी संहिताओं (तैत्तरीय, मेत्रायणी, काक, काठक, माध्यन्दिनि, काण्व) में समान-रूप से पाठ आया है।

‘माध्यन्दिनि संहिता’ के भाष्य-कर्त्ता उव्वट, महीधर भाष्यकारों ने जैसा अर्थ इसका लिया है, उसका सार यहाँ देते हैं। पं० ज्वालाप्रसाद कृत मिश्र भाष्य में इसका हिन्दी अनुवाद भी दिया गया है।

“शुक्ल यजुर्वेद माध्यन्दिनि संहिता‘ के पाँचवें अध्याय की २३, २४, २५ वीं कण्डिकाओं में अभिचार-कर्म की निवृत्ति में श्रीबगला महा-शक्ति का वर्णन इस प्रकार आया है-
‘ रक्षोहणं वलग-हनं वैष्णवीमिदमहं तं वगलमुत्किरामि । ‘
अर्थात् ‘राक्षसों द्वारा किए गए अभिचार की निवृत्ति के लिए वैष्णवी महा-शक्ति को प्रतिपादन करनेवाली महा-वाणी को इन्द्र से कहो’ इत्यादि प्रसङ्ग में बगला-मुखी विद्या का स्वरूप वेद ने परम-रहस्य रूप से बताया है।
वेद में तन्त्र-शास्त्र – प्रसिद्ध बगला-पद ‘वलगा’-इस व्यत्यय नाम से कहा जाता है ।
इसका अर्थ उव्वट ने ऐसा किया है-

‘वलगान् कृत्या -विशेषान् भूमौ निखनितान् शत्रुभिर्विनाशार्थं हन्तीति वलगहा तां वलग-हनम् ।
अर्थात् ‘शत्रु के विनाश के लिए कृत्या-विशेष भूमि में जो गाड़ देते हैं, उन्हें नाश करनेवाली वैष्णवी महा-शक्ति को वलगहा कहते हैं।’ यही अर्थ वगला-मुखी का भी है।

‘खनु अवदारणे ‘ इम धातु से मुख’ शब्द बनता है, जिसका अर्थ मुख में पदार्थ का चर्वण या विनाश ही अभिप्रेत होता है। इस प्रकार शत्रुओं द्वारा किए हुए अभिचार को नष्ट करनेवानी महा-शक्ति का नाम ‘बगला-मुखी’ चरितार्थ होता है। श्रीमहीधर ने इसका स्पष्ट अर्थ ऐसा किया है-
‘पराजयं प्राप्य पलायमानं राक्षसैरिन्द्रादि-वधार्थमभिचार-रूपेण भूमौ निखाता अस्थि केश-नखादि-पदार्था: कृत्या-विशेषा वलगाः।
अर्थात् ‘ इन्द्रादि देवताओं द्वारा पराजित होकर भागे हुए राक्षसों ने देवताओं के बध के लिए अस्थि, केश, नखादि पदार्थों के द्वारा अभिचार किया।’
‘तैत्तरीय ब्राह्मण’ में भी कहा है- असुरा वै निर्यन्तो देवानां प्राणेषु वलगान् न्यखनन् अर्थात् देवताओं को मारने के लिए असुरों ने अभिचार किया।
‘शतपथ ब्राह्मण’ (३-४-३) में भी इसे इस प्रकार बताया है-
‘यदा वै कृत्यामुत्खनन्ति अथ सालसाऽमोघाऽभि- भवति तथा एवैष एतद्-यस्मा
अत्र कश्चित् द्विषन् भ्रातृव्यः कृत्यां वलगान् निखनति तानेवैतदुत्किरति ।
उक्त ही अर्थ इस वचन का भी है। ‘वलगा’का अर्थ महीधर ने इस प्रकार किया है-
‘यस्य बधार्थं क्रियते तं वृण्वन्नाच्छादयन् गच्छतीति वलगः।’
अर्थात् ‘जिसके वध के लिए कृत्या का प्रयोग किया जाता है, उसे गुप्त रीति से मार देता है।’ इसीलिए महर्षि यास्क ने ‘वलगो वृणौतः’ (निघण्टु ६) वृञ् आच्छादने’ घातु से बनाया है। ‘वलगान्’ इसी द्वितीयान्त पद के अनुकरण से ‘बगला’ तान्त्रिक नाम निष्पन हुआ है।
भगवती के ‘बगला-मुखी’ इस संज्ञा नाम की सिद्धि पर वैयाकरण लोग आपत्ति करते हैं कि यह नाम अशुद्ध है क्योंकि ‘नख-मुखात् संज्ञायाम्’ इस सूत्र से डीष्’ प्रत्यय का निषेध होकर आ-प्रत्यय होकर ‘बगला-मुखा’ ही नाम शुद्ध है, परन्तु ‘स्वाङ्गाच्चोपसर्जनादसंयोगोपधात्’ इस सूत्राधिकार से उक्त सूत्र की प्रवृत्ति होती है। यहाँ ‘मुखी’ शब्द स्वाङ्ग-वाची नहीं है। बगला के नि:सारण में ही ‘मुख’ शब्द का प्रयोग है। ‘मुखं निःसरणम् इत्यमरः’ तथा ‘मुखमुपाये प्रारम्भे श्रेष्ठे निःसरणास्ययोः इति हैमः ‘। उपाय, प्रारम्भ, श्रेष्ठ, नि:सरण और मुख के अर्थ में ही ‘मुख
शब्द का प्रयोग होता है। अत: उक्त सूत्र की यहाँ प्राप्ति ही नहीं है। ज्वाला-मुखी, सूर्य-मुखी, गौ-मुखी शब्दों की तरह यह शब्द भी सिद्ध ही है।

माँ बगलामुखी साधना से सम्बंधित अधिक जानकारी के लिए गुरुदेव श्री योगेश्वरानंद जी से संपर्क करें – 9917325788, 9410030994

श्री बगला-ध्यान-साधना

भगवती बगला के ‘ध्यान’ को समझकर उसका समुचित रूप से ज्ञान प्राप्त करना परम आवश्यक है। ‘ध्यान´ के अनुसार चिन्तन होने पर ही सिद्धि प्राप्त होती है इसीलिए कहा गया है- `ध्यानं विना भवेन्मूकः, सिद्ध-मन्त्रोऽपि साधकः ।’ अर्थात् ध्यान के बिना सिद्ध-साधक भी गूँगा ही रहता है।

भगवती बगला के अनेक ‘ ध्यान’ मिलते हैं। ‘तन्त्रों’ में विशेष कार्यों के लिए विशेष प्रकार के ‘ध्यानों’ का वर्णन हुआ है। यहाँ कुछ ध्यानों का एक संग्रह दिया जा रहा है। आशा है कि बगलोपासकों के लिए यह संग्रह विशेष उपयोगी सिद्ध होगा, वे इसे कण्ठस्थ अर्थात् याद करके विशेष अनुभूतियों को प्राप्त करेंगे।

चतुर्भुजी बगला
सौवर्णासन-संस्थितां त्रि-नयनां पीतांशुकोल्लासिनीम्,
हेमाभाङ्ग-रुचिं शशाङ्क-मुकुटां स्रक्-चम्पक-स्र्ग -युताम्!
हस्तैर्मुद्गगर – पाश -वज्र-रसनां संविभ्रतीं भूषणै –
व्याेँप्ताङ्गीं बगला-मुखीं त्रि-जगतां संस्तम्भिनीं चिन्तये | |

अर्थात् सुवर्ण के आसन पर स्थित, तीन नेत्रोंवाली, पीताम्बर से उल्लसित, सुवर्ण की भाँति कान्ति- मय अङ्गोवाली, जिनके मणि-मय मुकुट में चन्द्र चमक रहा है, कण्ठ में सुन्दर चम्पा पुष्प की माला शोभित है, जो अपने चार हाथों में- १. गदा, २. पाश, ३. वज्र और ४. शत्रु की जीभ धारण किए हैं, दिव्य आभूषणों से जिनका पूरा शरीर भरा हुआ है-ऐसी तीनों लोकों का स्तम्भन करनेवाली श्रीबगला-मुखी की मैं चिन्ता करता हूँ।

द्वि-भुजी बगला मध्ये सुधाऽब्धि-मणि-मण्डप-रत्न-वेद्याम्, सिंहासनोपरि-गतां परि-पीत-वर्णाम् ।
पीताम्बराऽऽभरण-माल्य-विभूषिताङ्गीम्, देवीं नमामि धृत-मुदगर -वैरि-जिह्वाम् ।।१
जिह्वाग्रमादाय करेण देवीम्, वामेन शत्रून् परि-पीडयन्तीम् ।
गदाऽभिघातेन च दक्षिणेन, पीताम्बराढ्यां द्वि-भुजां नमामि ।।२


अर्थात् सुधा-सागर में मणि-निर्मित मण्डप बना हुआ है और उसके मध्य में रत्नों की बनी हुई चौकोर वेदिका में सिंहासन सजा हुआ है, उसके मध्य में पीले रङ्ग के वस्त्र और आभूषण तथा पुष्पों से सजी हुई श्रीभगवती बगला-मुखी को मैं प्रणाम करता हूँ।।१।॥ भगवती पीताम्बरा के दो हाथ हैं ; बॉए से शत्रु की जिह्वा को बाहर खींचकर दाहिने हाथ में धारण किए हुए मुद्र्गर से उसको पीड़ित कर रही हैं ||2||

चतुर्भुजी बगला (मेरु-तन्त्रोक्त) गम्भीरां च मदोन्मत्तां, तप्त-काञ्चन-सन्निभाम् । चतुर्भुजां त्रि-नयनां, कमलासन-संस्थिताम || मुद्-गरं दक्षिणे पाशं, वामे जिह्वां च वज्रकम् ।पीताम्बर-धरां सान्द्र-वृत्त-पीन-पयोधराम‌् || हेम-कुण्डल-भूषां च, पीत-चन्द्रार्ध-शेखराम् । पीत-भूषण-भूषां च, स्वर्ण-सिंहासन-स्थिताम‌् ||
अर्थात् साधक गम्भीराकृति, मद से उन्मत्त, तपाए हुए सोने के समान रङ्गवाली, पीताम्बर धारण किए वर्तुलाकार परस्पर मिले हुए पीन स्तनोंवाली, सुवर्ण-कुण्डलों से मण्डित, पीत-शशि-कला-सुशोभित, मस्तका भगवती पीताम्बरा का ध्यान करे, जिनके दाहिने दोनों हाथों में मुद्र्गर और पाश सुशोभित हो रहे हैं तथा वाम करों में वैरि-जिह्ना और वज्र विराज रहे हैं तथा जो पीले रङ्ग के वस्त्राभूषणों से सुशोभित होकर सुवर्ण-सिंहासन में कमलासन पर विराजमान हैं।

चतुर्भुजी बगला (बगला-दशक)
वन्दे स्वर्णाभ-वर्णां मणि-गण-विलसद्धेम- सिंहासनस्थाम् ।
पीतं वासो वसानां वसु – पद – मुकुटोत्तंस- हाराङ्गदाढ्याम् ।।
पाणिभ्यां वैरि-जिह्वामध उपरि-गदां विभ्रतीं तत्पराभ्याम् ।
हस्ताभ्यां पाशमुच्चैरध उदित-वरां वेद-बाहुं भवानीम् ।।

अर्थात् सुवर्ण जैसी वर्णवाली, मणि-जटित सुवर्ण के सिंहासन पर विराजमान और पीले वस्त्र पहने हुई एवं ‘वसु-पद’ (अष्ट-पद/अष्टापद) सुवर्ण के मुकुट, कण्डल, हार, बाहु-बन्धादि भूषण पहने हुई एवं अपनी दाहिनी दो भुजाओं में नीचे वैरि-जिह्वा और ऊपर गदा लिए हुईं, ऐसे ही बाएँ दोनों हाथों में ऊपर पाश और नीचे वर धारण किए हुईं, चतुर्भुजा भवानी (भगवती) को प्रणाम करता हूँ।

श्रीब्रह्मा द्वारा उपासिता श्रीबगला-मुखी

वादी मूकति, रङ्कति क्षिति-पतिर्वैश्वानरः शीतति ।
क्रोधी शान्तति, दुर्जनः सुजनति, क्षिप्रांनुगः खञ्जति ।।
गर्वी खर्वति, सर्व-विच्च जड़ति त्वद्-यन्त्रणा यन्त्रितः ।
श्री-नित्ये बगला-मुखि! प्रति-दिनं कल्याणि! तुभ्यं नमः ।।

युवतीं च मदोन्मत्तां, पीताम्बरा-धरां शिवाम् । पीत-भूषण-भूषाङ्गीं, सम-पीन-पयोधराम्॥
मदिरामोद-वनां प्रवाल-सदृशाधराम् । पान-पात्रं च शुद्धिं च, विभ्रतीं बगलां स्मरेत् ।

पीताम्बर-धरां सौम्यां, पीत-भूषण-भूषिताम् । स्वर्ण-सिंहासनस्थां च, मूले कल्प-तरोरधः ॥
वैरि-जिह्वा-भेदनार्थं , छूरिकां विभ्रतीं शिवाम् । पान-पात्रं गदां पाशं, धारयन्ती भजाम्यहम् ।॥

सर्व-मन्त्र-मयीं देवीं, सर्वाकर्षण-कारिणीम् । सर्व- विद्या-भक्षिणीं च, भजेऽहं विधि-पूर्वकम् ॥

श्री अक्षोभ्य ऋषि द्वारा उपासिता श्रीबगला-मुखी
प्रत्यालीढ-परां घोरां, मुण्ड-माला-विभूषिताम् । खर्वां लम्बोदरीं भीमां, पीताम्बर-परिच्छदाम् ।।
नव-यौवन-सम्पन्नां, पञ्च-मुद्रा-विभूषिताम् । चतुर्भुजां ललज्जिह्वां , महा-भीमां वर-प्रदाम् ||
खड्ग-कर्त्री-समायुक्तां, सव्येतर-भुज-द्वयाम् । कपालोत्पल-संयुक्तां, सव्य-पाणि-युगान्विताम् । ।
पिङ्गोग्रैक-सुखासीनां, मौलावक्षोभ्य-भूषिताम् । प्रज्वलत्-पितृ-भू-मध्य-गतां दन्ष्ट्रा-करालिनीम्।
तां खेचरां स्मेर-वदनां, भस्मालङ्कार-भूषिताम् । विश्व-व्यापक-तोयान्ते, पीत-पद्मोपरि-स्थिताम् ।।

ऋषि श्रीनारद द्वारा उपासिता श्रीबगला-मुखी
चतुर्भुजां त्रि-नयनां, कमलासन-संस्थिताम् । त्रिशूलं पान-पात्रं च, गदां जिह्वां च विभ्रतीम् ।।
बिम्बोष्ठीं कम्बु-कण्ठीं च, सम-पीन-पयोधरां। पीताम्बरां मदाघूर्णां , ध्याये ब्रह्मास्त्र-देवतां ।।
पीताम्बरां पीत-माल्यां, पीताभरण-भूषिताम् । पीत-कञ्ज-पद-द्वन्द्वां , बगलां चिन्तयेऽनिशम् ।।

ऋषि श्रीदुर्वासा द्वारा उपासिता श्रीबगला-मुखी
चतुर्भुजां त्रि-नयनां, पीनोन्नत-पयोधराम् । जिह्वां खड्गं पान-पात्रं, गदां धारयन्तीं पराम् ।।
पीताम्बर-धरां देवीं, पीत-पुष्पैरलंकृताम् । बिम्बोष्ठीं चारु-वदनां, मदाघूर्णित-लोचनाम् ।।
सर्व-विद्याकर्षिणीं च, सर्व-प्रज्ञापहारिणीम् । भजेऽहं चास्त्र-बगलां,सर्वाकर्षण-कर्मसु ।।

ऋषि श्रीवशिष्ठ द्वारा उपासिता श्रीबगला-मुखी
पीताम्बर-धरां देवीं द्वि-सहस्त्र-भुजान्विताम । सान्द्र-जिव्हां गदा चास्त्रं, धारयन्तीं शिवां भजे । ।

ऋषि श्रीअग्नि-वराह द्वारा उपासिता श्रीबगला- मुखी
विलयानल-सङ्काशां , वीरां वेद-समन्विताम् । विराण्मयीं महा-देवीं, स्तम्भनार्थे भजाम्यहम् ।।

ऋषि श्रीकालाग्नि-रुद्र द्वारा उपासिता श्रीबगला-मुखी
जातवेद-मुखीं देवीं, देवतां प्राण-रूपिणीम् । भजेऽहं स्तम्भनार्थं च, चिन्मयीं विश्व-रूपिणीम् ।।

ऋषि श्रीअत्रि द्वारा उपासिता श्रीबगला-मुखी
ज्वलत्-पद्मासन-युक्तां कालानल-सम-प्रभाम् । चिन्मयीं स्तम्भिनीं देवीं, भजेऽहं विधि-पूर्वकम्।।

ऋषि श्रीदारुण द्वारा उपासिता श्रीबगला-मुखी
ध्याये प्रेतासनां देवीं, द्वि-भुजां च चतुर्भुजाम् । पीत-वासां मणि-ग्रीवां, सहस्त्रार्क-सम-द्युतिम् ।

ऋषि श्रीसविता द्वारा उपासिता श्रीबगला-मुखी
कालानल-निभां देवीं, ज्वलत् – पुञ्ज-शिरोरुहां। कोटि-बाहु-समायुक्तां, वैरि-जिह्वा-समन्वितां।।
स्तम्भनास्त्र-मयीं देवीं, दृढ-पीन-पयोधराम् । मदिरा-मद-संयुक्तां, वृहद्-भानु-मुखीं भजे ।।

श्रीबगला- पटलोक्त ध्यान
उद्यत्-सूर्य-सहस्त्राभां, मुण्ड-माला-विभूषिताम् । पीताम्बरां पीत-प्रियां, पीत-माल्य-विभूषिताम् ।।
पीतासनां शव-गतां, घोर-हस्तां स्मिताननाम् । गदारि-रसनां हस्तां, मुद्गरायुध-धारिणीम् ।।
नृ-मुण्ड-रसनां बालां, तदा काञ्चन-सन्निभाम् । पीतालङ्कार-मयीं, मधु-पान-परायणाम् ।
नानाभरण-भूषाढ्यां, स्मरेऽहं बगला-मुखीम्।।

श्रीब्रह्मास्त्र कल्पोक्त सूर्य- मण्डल-स्थित श्रीबगला- मुखी का ध्यान
नव-यौवन-सम्पन्नां, सर्वाऽऽभरण-भूषिताम् । पीत-माल्यानुवसनां, स्मरेत् तां बगला-मुखीम् ।।

श्रीसांख्यायन-तन्त्रोक्त भगवती बगला के विविध ध्यान
चलत्-कनक-कुण्डलोल्लासित-चारु-गण्ड-स्थलां।
लसत् – कनक- चम्पक-द्युतिमदिन्दु – बिम्बाननाम् ।।

गदाहत – विपक्षकां कलित – लोल-जिह्वाञ्चलां ।
स्मरामि बगला-मुखीं विमुख-वाङ्-मन-स्तम्भिनीं ।1।

पीयूषोदधि-मध्य – चारु – विलसद् – रत्नोज्ज्वले मण्डपे ।
श्री – सिंहासन – मौलि-पातित-रिपुं प्रेतासनाध्यासिनीम् ।।
स्वर्णाभां कर-पीडतारि-रसनां भ्राम्यद्-गदां विभ्रतीम् ।
यस्त्वां पश्यति यान्ति तस्य विलयं सद्योऽम्ब! सर्वापदः ।2।

पीत – वर्णां मदाघूर्णां, सम – पीन – पयोधराम‌् ।
चिन्तयेद् बगलां देवीं, स्तम्भनास्त्राधि-देवताम् ।3।  

पाठीन-नेत्रां परिपूर्ण-गात्रां, पञ्चेन्द्रिय-स्तम्भन-चित्त-रूपां ।
पीताम्बराढ्यां पिशिताशिनीं तां, भजामि स्तम्भन-कारिणीं सदा ।4।

पीताम्बर-धरां सान्द्रां, पूर्ण-चन्द्र-निभाननाम् ।
वामे जिह्वां गदामन्ये, धारयन्तीं भजाम्यहम् ।5।

बिम्बोष्ठीं चारु-वदनां, सम-पीन-पयोधराम् ।
पान – पात्रं वैरि – जिह्वां, धारयन्तीं शिवां भजे ।6।

पीताम्बरालंकृत-पीत-वर्णां, सप्तोदरीं शर्व-मुखामरार्चिताम् ।
पीन-स्तनालंकृत-पीत-पुष्पां, सदा स्मरेऽहं बगला-मुखीं हृदि ।7।

कम्बु-कण्ठीं सु-ताम्रोष्ठीं, मद-विह्वल-चेतसाम् ।
भजेऽहं बगलां देवीं, पीताम्बर – धरां शिवाम् ।8।  

नमामि बगलां देवीमासव-प्रिय – भामिनीम् ।
भजेऽहं स्तम्भनार्थं च, गदां जिह्वां च विभ्रतीम् ।9।

कौलागमैक-संवेद्यां, सदा कौल-प्रियाम्बिकाम् ।
भजेऽहं सर्व – सिद्धयर्थ, वगलां चिन्मयीं हृदि ।10।

निधाय पादं हृदि वाम-पाणिनां, जिह्वां समुत्पाटन-कोप-संयुताम् ।
गदाभिघातेन च भाल-देशके, अम्बां भजेऽहं बगलां हृदम्बुजे ।11।

सुधाब्धौ रत्न-पर्यङ्के, मूले कल्प-तरोस्तथा ।
ब्रह्मादिभिः परिवृतां, बगलां भावयाम्यहम् ।12।

पीत-वर्णां मदाघूर्णां, दृढ-पीन-पयोधराम् ।
वन्देऽहं बगलां देवीं, स्तम्भनास्त्र-स्वरूपिणीम् ।13।

पीत-बन्धूक-पुष्पाभां, बुद्धि-नाशन-तत्पराम् ।
वन्देऽहं बगलां देवीं, स्तम्भनास्त्राधि-देवताम् ।14।

जिह्वाग्रमादाय कर-द्वयेन, छित्वा दधन्तीमुरु-शक्ति-युक्तां।
पीताम्बरां पीन-पयोधराढ्यां, सदा स्मरेऽहं बगलाम्बिकां हृदि ।15।

नमस्ते बगलां देवीं, जिह्वा-स्तम्भन-कारिणीम् ।
भजेऽहं शत्रु-नाशार्थं, मदिरासक्त-मानसाम् ।16।

  चतुर्भुजां त्रि-नयनां, पीत-वस्त्र-धरां शिवाम् ।
वन्देऽहं बगलां देवीं, शत्रु-स्तम्भन-कारिणीम् ।17।

सर्वावयव-शोभाढ्यां, सम-पीन-पयोधराम् ।
हृदि सम्भावये देवीं, बगलां सर्व- सिद्धिदाम् ।18।

पर – प्रज्ञापहारीं तां, पर – गर्व – प्रभेदिनीम् ।
पर – विद्या -भक्षिणीं तां, बगलां हृदि भावये ।19।

नमस्ते देव-देवेशीं, जिह्वा-स्तम्भन-कारिणीम् ।
पान-पात्र-गदा-युक्तां, भजेऽहं बगला-मुखीम् ।20।

स्वर्ण-सिंहासनासीनां, सुन्दराङ्गीं शुचि-स्मिताम् ।
बिम्बोष्ठीं चारु – नयनां, ध्याये पीन-पयोधराम् ।21।

अम्बां पीताम्बराढ्यामरुण-कुसुम-गन्धानुलेपां त्रि-नेत्रां ।
गम्भीरां कम्बु-कण्ठीं कठिन-कुच-युगां चारु-बिम्बाधरोष्ठीं।।
शत्रोर्जिह्वां च खड्गं शर-धनु-सहितां व्यक्त-गर्वाधि-रूढां ।
देवीं तां स्तम्भ – रूपां हृदि परिवरसितमम्बिकां तां भजामि ।22।

%d bloggers like this: